कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0746

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कल एक बार को लगा कि बस अब वो ख़ुशी के मारे मर ही जाएगी। फ़ोन…

कल एक बार को लगा कि बस अब वो ख़ुशी के मारे मर ही जाएगी। फ़ोन तो अमूमन रोज़ ही बजता है। पर घंटी के साथ स्क्रीन पर " इश्क़" फ़्लैश हो रहा था। इश्क़ .... अभी इस समय ? आवाज़ उस तरफ से आयी। सुनी भी गई... पर इस तरफ से क्या गया वो खुद भी न जानती थी। धककक .... बस फ़ोन अब बिस्तर पर पड़ा है। तुम कैसी सी हो यार? शिकायतें तो ये थी उनसे कि वो कुछ बोलते नहीं । तुम्हें उन्हें सुनना था ।ये कहना था और वो भी पूछना था । तुम क्यों नहीं बोल पाई? परेशानी है क्या तुम्हारी ? चाहती क्या हो ? डर क्यों गई या unexpected चीज़ें हैंडल नहीं होती तुमसे । Unexpected शख्शियत भी तो तुम्हारी ही चॉइस है। सीखो अब।बोलना नही चुप रहना ।इश्क़ में चुप रहना सीख लो उनसे ।कितना कम बोले। कितने भीतर तक पहुंचे।और तुम एक शब्द दिलकश नहीं बोल पायी। अब क्या फ़ोन को देख रही हो ?अब कॉल disconnect हो गया । अगली बार बजे ना बजे । इश्क़ की झालर बुनना बंद करो। क्या क्या कह सकती थी ये बेवजह वाली फ़ेहरिश्त न बनाओ। Will u please sleep now.? वो अनकहा समझ जाते हैं ।देखो मुस्कुरा रहे। सच है वो और ये तस्वीर दोनों एक जैसे हैं ।दोनों बोलते नहीं।समझ जाते हैं। फ़ोन switch off करो।इश्क़ भी सो गए होंगे। 😊😊😊😊😊😊😊😊याद
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें