कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0745

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सुनो! बूझो मत उसे ,महसूस करो।

सुनो! बूझो मत उसे ,महसूस करो। छू कर देखो ये जो कुछ मैं अगली पंक्तियों में लिखूंगी ... इक गीत है पर मीठा नहीं इक किस्सा जो होता नहीं करीब है मेरे .... बेहद करीब तह में ....कभी सतह में वो वज्र भी है ....मोम भी निर्वात भी और.... व्योम भी टूटी .... झुलसी ... कुरेदी हुई.... फिर भी इक शक्ति गुलाब नहीं ... कोई कंटक जंगली लगे औरत सी कभी देवी ....पत्थर सरीखी इधर उधर बिकती हुई रोज़ रोज़ दिखती हुई .. उसे पूछा जाना मायने नहीं रखता वो कहती भी नहीं बस रह जाना चाहती है इन आँखों में.....इस आसपास की चुप में उसे हो जाने दो उसे रह जाने दो मुझे रोक लो अब इससे ज्यादा कुछ कहने से उससे प्रेम कत्तई ना करो बस मेरी पंक्तियों में उसे इक बार सुन भर लो।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें