भाषा / Language
आज एक खुशी बांट लूँ ... इस बार जून अंक की
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आज एक खुशी बांट लूँ ... इस बार जून अंक की
"अहा ज़िन्दगी "में मेरी दो इत्तु इत्तु कविता छपी हैं।
पिछली बार सिर्फ सराहनीय प्रस्तुति में नाम छपा था।तभी लिखा था मैंने आज नाम छपा कल शब्द छपेंगे। ईश्वर खुश है मुझ पर। आप सब का बहुत बहुत आभार ...
प्रोत्साहन आपको कहाँ नहीं ले जा सकता और क्या नहीं करा सकता। आप सब मेरी खुशियों में शामिल रहिये ।
kp smiling😊😊😊😊
आभार आपका Ishu Nangia ji आपने इसे सांझा किया।😊😊😊
औरत.....
दिन के उठने से कई घंटों पहले....
अपना सूरज उगा लेती हो
और देर रात तक.....
इन तारों को बुहारती रहती हो
ज़िन्दगी.......
तुम भी "औरत" हुए जा रही हो।
वजूद....
जब भी उसका अहम् ज़ख्मी होता है
मैं अपना इक टुकड़ा वजूद उस पर धर देती हूँ
दरारें भर जाती हैं
दर्द भी उभर नहीं पाता
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें