कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
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रचना 0724

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कितनी बार ......जाने कितनी बार न कह सकने की मेरे शब्दों की…

कितनी बार ......जाने कितनी बार न कह सकने की मेरे शब्दों की असमर्थता मुझमें कविता होकर उभरती है। तब कविता बिना शब्दों वाला सन्नाटा होता है जो कागज़ पर पड़ते ही धुआं हो जातीे है.......ठीक तुम्हारी उस अधजली सिगरेट की तरह.... तुम भी तो कागज़ में धुंआ लेकर जलते हो बिना बोले बिना कहे । अरसे से बिना शब्द की कहानियां कहते हो जैसे। Saying no to addiction in kp style😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें