कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0725

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एक तिलिस्म बांधना था .......तो बस

एक तिलिस्म बांधना था .......तो बस उस शब्दों के फलक से कुछ अक्षर तोड़े और अपने इश्क़ से कुछ रंग सैंकड़ों चाहनाएँ सच कर डाली अब मंज़र ठहरने को है इन दूर तक जाती आंखों में और एक अनकही कविता चिपक गई है सीने में।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें