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रचना 0712

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तुम कागज़ पर शब्द रखते हो और मैं फ़ुर्सत

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तुम कागज़ पर शब्द रखते हो और मैं फ़ुर्सत .... बस यही फ़र्क हर बार रह जाता है दरमियां।कागज़ की सलवटें शिकायत भी नहीं करती अब।कुछ नुपूर बजने के लिए नहीं सजने के लिए बना दिये जाते हैं। शांत नुपूर सो गए। कविता कल फिर फ़ुर्सत ढूंढेगी और तुम फिर कविता में शब्द ढूंढ कर उसे नकार देना। सिलसिला किसी रोज़ रुके शायद.... तब तक मैं फ़ुर्सत में हूँ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें