ककल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0711

भाषा / Language

हर बार

✦
हर बार ...... सिर्फ शब्द ही तो होते हैं..... हमारे सेतु बस.... गिने चुने सीमायें ओढ़े और इक ....आहट धुंधली धुँधली हाँ .....और........ ना के बीच डोलती वो कुछ जो लिखा ही न गया हो अब तलक वो कुछ जो कहा ही न गया हो अब तलक पर उभर रहा है इस तरफ भी और .....शायद उस तरफ भी अदृश्य ..... अपार ..... अनंत ..... इस छोर से .....उस सिरे को महसूस होता हुआ महफ़ूज़ होता हुआ कुछ ....पनप रहा है शायद या ... चुका है ..... और ..... वाला है ..... के बीच दिख रहा है शायद मुस्कुराता हुआ ..... अब की मिलोगे तो .....पूछूंगी कि .... हम तो शब्द बोते हैं तो ...... ये प्रेम कैसे फ़ूट रहा है ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें