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रचना 0704

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मुझ से निकलकर कहीं तो जाता ही होगा मेरा सन्नाटा

मुझ से निकलकर कहीं तो जाता ही होगा मेरा सन्नाटा... शायद कैनवास पर या ....कोरे कागज पर सन्नाटा बदरंग लाख हो मेरा पर जब दर्ज़ होता है तो क्षितिज .....लाल हर्फ........ लाल स्याहि ....लाल रक्त ........लाल और शायद मेरा पूरा वजूद लाल। बोलते लाल रंगों में ज़िंदा रहना सीख गयी हूँ।मैं खुश रहना सीख गई हूं। ज़िन्दगी का विकल्प हो तो हो .... मेरा कोई नहीं। मैं सिर्फ मैं हूँ.... सुर्ख़ चाँद सी। Era Tak ji आपकी शानदार कृति पर मेरी कलम खुदबखुद बोल पड़ी।💐💐💐💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें