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रचना 0691

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सच है ......मैं कविता कागज़ पर नहीं लिखती ।

सच है ......मैं कविता कागज़ पर नहीं लिखती । एक बड़ा सच ये भी कि.....जब तक लिख न लूँ कागज़ के कई मुड़े तुड़े गोले मेरे अंतस को भारी करते जाते हैं। चुभते हैं बहुत। लिख लो तो आराम आता है। जैसे कोई समुन्दर सूख गया हो ।जैसे कोई मरु बह गया हो। कोई कम जादू का खेल है ये कागज़ वाला । मेरी जैसी भागती दौड़ती दो मिनट की कविता वाला 😊😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें