ककल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0668

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कहूँगी तो मानोगे नहीं

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कहूँगी तो मानोगे नहीं .... मैं लिखती कहाँ हूँ? शब्दों के बेशुमार फ़ूल साथ चलते हैं रूकती हूँ तो रुक जाते हैं मेरी तरफ झुक जाते हैं आंख मूंद कर छू दूँ तो महक जाते हैं कोई मुस्कुरा दे .... तो रह जाती हूँ मैं इक कविता कह जाती हूँ मैं सच..... कहूँगी तो मानोगे नहीं .... लिखती ही कहाँ हूँ मैं ज़िंदा हो जाती हूँ मैं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें