भाषा / Language
अपनी हर कविता के साथ
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अपनी हर कविता के साथ .....
मैं बहुत सारी नदी बहा देती हूँ
और कुछ पत्थर खुद में रोक लेती हूँ ....
इक नयी कविता को आकार देने के लिए ....
ना नदी छोटी होती है
न पत्थर कम नुकीले
कविता खुश है..... बेहद खुश
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें