भाषा / Language
"अस्तित्व"
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"अस्तित्व" ..
अपने "अस्तित्व" को
इन प्रतिकूल लहरों से
बचा लूंगी
कुव्वत है मुझमें !
गर्भ ही से अपना वजूद
मुठी में भींचे पल रही हूँ
अपनी लकीरों को
पतंग की डोर के साथ तो
कब का गूँथ चुकी
अब
अपना आसमान
अपनी उड़ान
तय करने के लिए
जद्दोजहद नहीं करती
हक़ से चुनाव करती हूँ
और छीन लेने का
जिगर भी रखती हूँ
उस तराजू का
हमेशा "हल्का वाला सिरा"
मेरे नाम कर देने वाली
इस मानसिकता पर
"पहाड़ सा "
अस्तित्व धर दिया है मैंने
"निशब्द" कर चुकी हूँ सबको
अब मेरी बोली नहीं लगती
"अनमोल वाली" पट्टी
कुरेद ली है अपने ऊपर
अपने हिस्से का
गम और खुशियां
प्रेम और तन्हाईयाँ
मैं खुद चुनती हूँ
अस्तित्व की दीवार में
मैं कुछ भी
पराया रिसने नहीं देती
अब ऐसा सब कुछ
जो मुझे जकड़ने में सक्षम है
जीत नहीं सकता
वज्र हो गयी हूँ
मोह..... पाश
शर्म .....हया
विचार.... संस्कार
सब के दायरे
सिमित कर दिए हैं मैंने
फ़िज़ूल का कचरा
जमने नहीं देती
अपनी परिधि के आस पास
खुश हूँ .....
बहुत खुश
और जीवित भी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें