ककल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0587

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इक ऐसे जहाँ में जन्मी हूँ

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इक ऐसे जहाँ में जन्मी हूँ ..... हां कह दूं इच्छा से ......तो मारी जाऊंगी ना कह दूँ .......इच्छा के विरुद्ध तो मसल दी जाऊंगी कुछ कह दूं तो .......सुनी नहीं जाऊंगी सुन भी ली गयी तो...... होठों पर चिपक जाऊंगी मूक बधिरों के बीच उग आयी हूँ..... खर पतवार की तरह बस अनचाही .....अनजानी सी सुनो...... जिनका ह्रदय नहीं होता...... वो स्त्री पुरुष तो नहीं होते तो मैं किनके बीच सांस ले रही हूँ ? शायद वस्तुओं के बीच वास्तविकता कह दी सुन नहीं पाए .......बेचारे
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें