कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0540

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अब की

अब की .... "सुन्दर मुरादों" वाले .... दीपक नहीं खरीदे बाज़ार से इस बार .... "सुन्दर इरादों " वाले .... दीपक मन में गढ़ रही हूँ उसी से "मन की देहलीज़" सजा रही हूँ ...... साल भर .....झिलमिलाना भी तो है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें