कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0539

भाषा / Language

कुछ लम्हे..... पथराए हुए भी रोज़ जीते हैं मुझमें

कुछ लम्हे..... पथराए हुए भी रोज़ जीते हैं मुझमें छू के देखिये ....मेरी डायरी की नब्ज़ चल रही इन शब्दों में ......गर्माइश भी है अभी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें