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रचना 0494

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बहुत ख़ुशी होती है जब अपनी रचना को दूसरे के नज़रिए से देखने क…

बहुत ख़ुशी होती है जब अपनी रचना को दूसरे के नज़रिए से देखने को मिलता है .... आज वैसा ही हुआ ...thank u neelam ji ... सही कहती हो तुम लिखना कहाँ जानती हो तुम तो सिर्फ मुझे पढ. गढ रही हो तुम पी रही हो अपने हिस्से का समन्दर और मैं झरने सा कल कल करता जल बन समा रहा तुझमे तुम पी रही हो उतारा हुआ अँधेरा और मैं मैं जी रहा हूँ तुम्हारा दिया हुआ सवेरा सच कहती हो तुम कब मिलती हो मुझे कागज़ की आडी टेडी रेखाओं में . तुम तो मुझे मिलती हो मेरी कविताओं में हाँ ... अब मैने भी कोरे पन्नों को छू कर तुम्हे जान लिया है इसिलिये तो बिन छुए तुम्हे अपना मान लिया है ...नीलम... कल्पना जी की रचना से प्रेरित हो लिखने की नाकाम सी कोशिश 🙏🙏🙏
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें