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रचना 0495

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क्यों नहीं बह सकती इक धारा समुन्दर की तहों में

क्यों नहीं बह सकती इक धारा समुन्दर की तहों में ? कभी देखो तो सही .....मुझे खुद में गुज़रते हुए अब ये ना कहना..... तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं ☺☺☺☺☺☺
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें