भाषा / Language
जिस किसी भी रोज़
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जिस किसी भी रोज़ .....
तुम्हारी यादों की झड़ी लगी है
कुछ आंखों से रिसता हुआ
होठों पर अनकहा सा रुका है
उस हर दिन....
मैं मौन हुई हूँ
पर ....
मेरे शब्द थिरके हैं
तुम्हारे नाम की थाप पर
अनुगूँज .....मेरे जश्न की
पहुँची तो होगी जरूर
जैसे की आज
ठीक वैसे ही ......
सुनो.....
देखो ना...मैं मौन हूँ
और मेरे शब्द ....थिरक रहे हैं
जश्न जारी है....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें