कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0493

भाषा / Language

जिस किसी भी रोज़

जिस किसी भी रोज़ ..... तुम्हारी यादों की झड़ी लगी है कुछ आंखों से रिसता हुआ होठों पर अनकहा सा रुका है उस हर दिन.... मैं मौन हुई हूँ पर .... मेरे शब्द थिरके हैं तुम्हारे नाम की थाप पर अनुगूँज .....मेरे जश्न की पहुँची तो होगी जरूर जैसे की आज ठीक वैसे ही ...... सुनो..... देखो ना...मैं मौन हूँ और मेरे शब्द ....थिरक रहे हैं जश्न जारी है....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें