कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0430

भाषा / Language

जिस भी रोज़

जिस भी रोज़ ..... मेरा सा कुछ ....कुछ तुम मुझमें धरते चले जाते हो ..... मैं ......मुकम्मल नज़र जाती हूँ फिर..... मैं ही मैं होती चली जाती हूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें