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रचना 0418

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मेरे जेहन की उस इक टुकड़ा धूप को खुरच के देखो

मेरे जेहन की उस इक टुकड़ा धूप को खुरच के देखो .... तुम्हें मध्यम आंच में रौशनी परोसता चाँद ही नज़र आएगा थोड़ी अलग हूँ ना मैं ? भूल गए ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें