कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0291

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कोरे कागज़ पर

कोरे कागज़ पर ..... कुछ खामोश लफ्ज़ धर के तो देखो कुछ पिघलते रंग भर के तो देखो देखो तो सही .....एक बार एहसास के इस पार से .......उस पार पहली बार और शायद .......आखिरी बार क्या पता मैं नज़र आ जाऊं इन शब्दों की सलवटों में इन रंगों की आहटों में तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी .....कल्पना बनकर कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें