कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0292

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चख के देखा

चख के देखा ..... आज भी .... तुम्हारे लिखे खतों का ...... ज़ायक़ा वही है...... बस जरा ..... चाश्नी कम .....नमक ज्यादा हुआ क्या करूँ ? बहते ..... गीले ..... सीले...... लफ़्ज़ों का अब लहज़ा यही हुआ कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें