कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0081

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आज की तारीख.......😞😞😞😞😞😞😞

आज की तारीख.......😞😞😞😞😞😞😞 आज की तारीख ही अपशगुनी है या अपने माथे पे इक कलंक लगाने का ठेका ले कर जन्मी है ? ऐसा तो नहीं की दहशत और दहशतगर्दों को मुहब्बत हो गयी है इस काले दिन से ये जो चीत्कार से उगा था पिछले साल और अस्त हुआ इस साल उससे भी कई गुना दुगनी चीखों , चीत्कारों , पुकारों और कलेजे को चीर देने वाली इस कायरता पूर्ण कृत्य के साथ सो नहीं पायेगी ये तारीख चैन से , श्रापित सी हो गयी है कभी निर्भया .....चीखेगी तो कभी मासूम जानें दागेंगी गोलियां उन हैवानों पर उनकी नपुंसक सोच पर ये तारीख हर साल शर्मसार होगी ज़ार ज़ार रोयेगी . Feeling very sad for little angels who lost their lives for no fault of theirs .
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें