कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0037

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मेरी लेखनी

मेरी लेखनी..... बहुत देर से मैं ...... बैठी हूँ एक ख़याल के साथ अल्फ़ाज़ों को पहन उतार कर देखती हुई कभी लफ़्ज़ों के पर्याय ढूंढ़ती हुई कभी शब्दों को धोकर पोछती हुई कभी मिसरा बदल कर बिछाती हुई कभी एहसास तेह लगाती हुई कभी काफ़िया कतार में सजाती हुई कभी लय कभी बहर उधार लाती हुई कभी ख़याल से बोरियत मिटाती हुई कभी विचारों की पुनरावृति घटाती हुई कभी भारी को हल्का कराती हुई कभी अतिश्योक्ति कर हंसाती हुई कभी शेरो में दिल बसाती हुई कभी इत्तू इत्तू शब्द घुसाती हुई कभी अनेकार्थी शब्द भिड़ाती हुई कभी बदरंग कोशिश में रंग भरती हुई आम बात नए लिबास में पेश करती हुई कभी मिलते जुलते शब्दों की बंदिश करती हुई कभी उर्दू के शब्दों से खूबसूरती गढ़ती हुई पर हर बार कल्पना का स्पर्श कराती हुई मैं लिखती हूँ ....... अपने ख़याल को कागज़ पे खड़ा करती हूँ आपकी नज़र करती हूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें