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प्रेम न पुरुष है न स्त्री बल्कि एक प्रतीक है जिसे गौरवशाली…
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*प्रेम न पुरुष है न स्त्री बल्कि एक प्रतीक है जिसे गौरवशाली सिंहासन पर किसी पुरुष या स्त्री ने प्रतिष्ठित कर दिया है
आराध्य कह कर।
*प्रेम का स्मृतिकोष समृद्ध है।
*प्रेम मुझ पर पड़ा मेरा ही वितान है जो औचक तुम्हारी तरफ झुक गया है।
*हेतु और आधार एक समान होते हुए भी भिन्न अवस्थाएँ हैं।
जैसे प्रेम और प्रेमिल।
*प्रेम एक अंतर्निहित गुण है ,जो चित्त और चरित्र के बीच आधा आधा बंटा हुआ है।
*प्रेम के पास खंडित दृष्टि नहीं है।
वह अखंड दृष्टा है।
*प्रेम की प्रभुता देने में रही।
प्रभुत्व उस दानी का रहा।
*प्रेम के मुख पर व्यथा के भाव हृदय की कथा कह जाते हैं।
* प्रेम सदा प्राप्ति और त्याग से परिपूर्ण था।
इसलिए अहंकारी रहा।
बस उस अहंकारी को अपने अहंकार का ज्ञान था ।
बोध बोधि को जन्म देता है।
यही प्रेम का सत्व
बोधिसत्व।
*धर्म, कर्म और मर्म को सिद्ध करना मनुष्यता है।
त्रिगुण मनुष्य कहां हुए?
देव हुए फिर तो।
*प्रेम त्रिताप धारण किया हुआ शक्ति सम्पन्न भाव है।
कभी
दैहिक,दैविक और भौतिक ताप से युक्त।
कभी
दैहिक, दैविक और भौतिक ताप से मुक्त।
*जाते आते साल मुबारक
जाते आते लोग मुबारक
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कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें