कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 4553

भाषा / Language

प्रेम न पुरुष है न स्त्री बल्कि एक प्रतीक है जिसे गौरवशाली…

*प्रेम न पुरुष है न स्त्री बल्कि एक प्रतीक है जिसे गौरवशाली सिंहासन पर किसी पुरुष या स्त्री ने प्रतिष्ठित कर दिया है आराध्य कह कर। *प्रेम का स्मृतिकोष समृद्ध है। *प्रेम मुझ पर पड़ा मेरा ही वितान है जो औचक तुम्हारी तरफ झुक गया है। *हेतु और आधार एक समान होते हुए भी भिन्न अवस्थाएँ हैं। जैसे प्रेम और प्रेमिल। *प्रेम एक अंतर्निहित गुण है ,जो चित्त और चरित्र के बीच आधा आधा बंटा हुआ है। *प्रेम के पास खंडित दृष्टि नहीं है। वह अखंड दृष्टा है। *प्रेम की प्रभुता देने में रही। प्रभुत्व उस दानी का रहा। *प्रेम के मुख पर व्यथा के भाव हृदय की कथा कह जाते हैं। * प्रेम सदा प्राप्ति और त्याग से परिपूर्ण था। इसलिए अहंकारी रहा। बस उस अहंकारी को अपने अहंकार का ज्ञान था । बोध बोधि को जन्म देता है। यही प्रेम का सत्व बोधिसत्व। *धर्म, कर्म और मर्म को सिद्ध करना मनुष्यता है। त्रिगुण मनुष्य कहां हुए? देव हुए फिर तो। *प्रेम त्रिताप धारण किया हुआ शक्ति सम्पन्न भाव है। कभी दैहिक,दैविक और भौतिक ताप से युक्त। कभी दैहिक, दैविक और भौतिक ताप से मुक्त। *जाते आते साल मुबारक जाते आते लोग मुबारक 💕
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें