भाषा / Language
स्त्री पर कई मौसम आते हैं
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*स्त्री पर कई मौसम आते हैं....
*हर मौसम उसका किरदार तय करता है।
*कभी कभी स्त्री के मौसम एक दूसरे से लिपट जाते हैं।
*जो स्त्री अपने मौसम से खुद को बचा ले जाती है वही प्रेमिका होती जाती है।
*उसका खुद से प्रेम का मौसम कोई नहीं तय करता। वो इसका हक़ अपने पास रखती है।इस मौसम में वो अक्षय होती है।
*अपने हर मौसम में स्त्री सा पूर्ण कोई नहीं होता।
*स्त्री के साथ उसके मौसम भी सो जाते हैं। हर किरदार कुछ देर ठिठका रहता है।
*जिस मौसम में स्त्री सबसे ज्यादा शिथिल और निर्भीक एक साथ हो वही उसका पसंदीदा मौसम होता है। उस मौसम में वो सांस लेती है। वो मल्लिका हो जाती है खुद की।
*स्त्री अपने सारे मौसम पारदर्शी रखती है बस इसलिए चुभती है।
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कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें