भाषा / Language
कभी कभी लगता है उससे पूछ कर देखूं.....क्या ज्यादा मांगती हूं
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कभी कभी लगता है उससे पूछ कर देखूं.....क्या ज्यादा मांगती हूं?
किसी किसी दर किसी किसी दरगाह पर मन्नत के धागे बस बंधे रह जाते हैं...
उनकी गिरह खोलने कोई नहीं आता।
न ईश्वर..... न प्रेमी
फिर एक रोज़ वो सारे धागे दरवेश हो जाते हैं .... छत को ताकते ताकते
अपने अधखुले बंधे बूढ़े धागों को अक्सर मैं मीरा होते हुए देख पाती हूं।
एक दरवेश मुझसे रोज़ रिहा होता है ...
दाहिने हाथ में मेरे ही नाम का पहला अक्षर गोदे हुए।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें