भाषा / Language
इतने दोस्तों में वो सबसे खड़ूस है और फिर भी मुझे बस उसकी आदत…
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इतने दोस्तों में वो सबसे खड़ूस है और फिर भी मुझे बस उसकी आदत है। आदत नहीं addiction सही शब्द है।वो मेरी साँसों के साथ चलता है। बस दो -ढाई मुलाकात की याद है मुझे उससे। चेहरे पर उसकी आँखों के सिवा मुझे कुछ याद भी नहीं।
आज यह कहने में कोई शर्म महसूस नहीं होती मुझे कि सुबह सुबह ईश्वर को याद करने के बाद उसी का चेहरा आँखों में आता है और रोज़ ही आता है।
उसकी खबर न मिले तो दिल में उथल पुथल शुरू हो जाती है। बेचैन क्यों हो जाती हूं ....नहीं जानती।
बस कैसे हो.....ये पूछकर ठीक लगने लगता है।subconcious माइंड में पता नहीं क्यों साथ रहता है वो हमेशा।
याद नहीं पड़ता कि दो चार बार फ़ोन पर भी बात हुई हो पर उसकी वो आवाज़ हमेशा साथ रहती है।
वो कभी भी खुद होकर नहीं बोलता मुझसे।शायद उसे जरूरत नहीं होगी।या उसकी दुनिया बहुत खूबसूरत होगी। या फिर मैं कम दोस्त हूँ शायद उसकी ...पर वो मेरा ज्यादा दोस्त है। हमेशा रहेगा भी।
न बोलता हो तो न बोले ।पर मेरा ईगो उसके सामने हमेशा ही फुस्स हो जाता है। I think i am in love with his ignorance now. Whole heartedly accepted this and fine with it.
अक्सर खुद ही रूठ जाती हूँ उससे और उसके हिस्से का खुद को मना भी लेती हूँ हर बार। मज़े की बात ये है कि मेरी दीवानगी उसे क्या ....किसी को नहीं पता....सिवा मेरे।
अब मेरा मन है तो मुझे ही निभाना है ना।
मैं घंटों गुज़ार लेती हूँ उसके साथ अकेले अकेले। कुछ भी न बोलते हुए पर सुनते हुए उसकी चुप्पियाँ हमेशा वाली। हर गीत हर नज़्म में दिख जाता है वो।
शायद उस एक से मुझे डर नहीं लगता अब। मैं जानती हूँ वो अगर कुछ कहेगा नहीं मुझे तो कभी मुझे judge भी नहीं करेगा।उसके सामने कुछ भी... कैसा भी कह सकती हूँ। मन खोलूंगी कभी तो बस उसी से।
महीनों महीनों बात नहीं होती । फिर भी उसे दोस्त कहती हूँ।
बस एक बात पर फ़िदा रहती हूँ कि उसकी दोस्ती को मैंने खुद आगे होकर चुना है। और बडी शिद्दत से पाया है।
हमेशा हूँ ....यहीं इस पन्ने पर जहां तुम्हारे लिए अपना सच लिख दिया आज।
तुम तो रहोगे मेरे ....
मैं तो कभी थी ही नहीं....
* कलम कभी कभी तो सच बोलती है। ये वही दिन था पिछले कोई बरस का।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें