कल्पनाशब्दों के बीच
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क्या जो मैं ये तुमसे कहूँ की तुमसे मिलने के बाद सिर्फ दो ही…

क्या जो मैं ये तुमसे कहूँ की तुमसे मिलने के बाद सिर्फ दो ही रंगों को ढूंढती हूँ ... एक सफ़ेद एक नीला.....तो ये मान लोगे क्या ? फ़ब्ता है ये combination तुम पर । उस रोज की एक यही याद याद है मुझे। कैसे कहूँ....ये तुम कागज़ सा असीम सफेद और उस स्याही सा अनहद नीला हो चुके हो मेरे लिए।बाकी सारे रंग खारिज़ किये दे रही हूँ । शुक्र है कुछ याद उस रोज एक तस्वीर भी हुई थी। तुम इसी में मुस्कुरा दिया करो मेरे लिए । इतना जो कर दो तो बहुत ही सारा होगा । वैसे भी तुम तो सुनते हो ....मैं ही कहती जाती हूँ।नीला सफेद तब हल्का असमानी हो जाता है । आज फिर बात नहीं हुई । फिर भी खुश कल्पना ढेर सारी स्माइली भेज रही।और सफेद नीले गुब्बारे भी । सफेद सवाल नीले जवाब हमारे बीच से उड़ जाएं तो इश्क़ दूर तक लिखा जाएगा। चलोगे दूर तलक ...?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें