कल्पनाशब्दों के बीच
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प्रेम में घात खाना इतना दुखद नहीं जितना प्रेमी को आंखों के…

प्रेम में घात खाना इतना दुखद नहीं जितना प्रेमी को आंखों के सामने घात देते हुए देखना । ये कई गुना दुखा जाता है।आप सैंकड़ों टुकड़ों में फट जाते हो और हर टुकड़ा उतनी ही ज़ोर से दुख रहा होता है। एक शब्द "क्यों" आत्मा की धमनियों में शोर करता रहता है। इसका लेप आंसू से नहीं चित्कार से बनता है। खुद ही को खोद कर खुद ही उसमें समा जाने पर ही आराम आता है। हार कर हार न मान लेने की जिद्द ही प्रेम है। प्रेमी को नकारना हो नहीं पाता और आप एक युद्ध करते रह जाते हो खुद से खुद में। अपनी पसंद को आसान नहीं होता झुठला देना। मार देना। प्रेम आसान नहीं .... इसलिए सबके झोली में गिरता भी नहीं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें