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आज अपनी देवरानी के ननिहाल अघार गांव भी जाना हुआ। अब वहां को…

आज अपनी देवरानी के ननिहाल अघार गांव भी जाना हुआ। अब वहां कोई नहीं रहता । सब बाहर बस गए हैं। पुराना मकान भी टूट गया है। ईजा बाऊजी के साथ वहां हम सब की यात्रा सुंदर रही। बहुत सालों बाद अपने पुश्तैनी घर में लौटने पर ईजा की खुशी देखने लायक थी। बचपन जहां गुजारा हो वह जगह तो वैसे भी स्वर्ग ही कहलाती है और पहाड़ों के बीच बसा यह गांव बेहद ही अद्भुत लग रहा था। उजाड़ पड़े घर में उन्होंने दीपक जला कर पूजा की। अपने नाती पोतों के साथ अपने घर लौटना कितना बड़ा सुख है। गांव की इष्ट देवी का मंदिर भी बहुत सुंदर था। आसपास के मकान भी टूट फूट गए हैं।कुछ एक को उनके मालिकों ने रिनोवेट कर होमस्टे की शक्ल दे दी है। ये देख कर लगता है कि अब भी आस बाकी है कि सुदूर पहाड़ के ये गांव अब भी इस आस में खूबसूरती बचाए बैठे हैं कि इनके वंशज यहां लौटेंगे और ये एक बार फिर आबाद होंगे। आज का दिन बेहद सुंदर याद मेरे मन में धर गया। ना थकान हुई न कोई परेशानी हुई। पहाड़ों से आज असल में मेरा मिलना हुआ। पलायन का दुख और अपनी धरोहर को बचाने की जुगत दोनों एक ही दिन देखने को मिला। ईश्वर का शुक्रिया इस दिन के लिए। ILa Joshi thank u ... For this lovely day
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें