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स्त्री को कविता बनता हुआ देखा है कभी

स्त्री को कविता बनता हुआ देखा है कभी ? दो उसे उसका प्रेम या दे कर देखो उसे उसका एकांत या फिर दो उसे एक ऐसा घाव जो भर न पाए वो उभर न पाए।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें