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बहुत मन था कि बिना आवाज़ भी दौड़ कर चली आऊं

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बहुत मन था कि बिना आवाज़ भी दौड़ कर चली आऊं... इस फेर तुमने पत्थर बाँध दिये। मन कहीं गहरे ...बहुत गहरे धंस गया। मेरी डूब से भी परे। *मेरी मुस्कान तुम तय करते हो..... मेरे लिए प्रेम की इतनी सी परिभाषा है। कितना सारा हो तुम.....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें