कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4405

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तुझे कैसा पता न चला... कि मैं

तुझे कैसा पता न चला... कि मैं.... *कुछ गीत बस होते ही चले जाते हैं .. तेरे और कभी कभी मेरे भी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें