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मेरी एक परेशानी ये भी है कि मैं अपने मन को कह चुकी कि तुम म…

मेरी एक परेशानी ये भी है कि मैं अपने मन को कह चुकी कि तुम मुझे अच्छे लगते हो। मन ने भी हामी भर दी है। अब इसे पोंछ नहीं सकती। ज़िन्दगी में तुमको इतना भर दिया है कि अपने लिए कम ही जगह बची है। जो ईश्वर से तुमको मांगे उसे तुम्हें नाराज़ नहीं करना चाहिए ... इस बात को महसूसने के लिए तुम्हें मेरे जितना प्रेम में पड़ना होगा। तुम कम पड़ते हो हमेशा। तुम्हें शायद इसी वजह से छोड़ दूँ। जिसने तुमको अपने मन का सबसे खूबसूरत खाली हिस्सा दिया हो, अपना सच दिखाया हो उसे इतनी आसानी से आम नहीं करना चाहिए। उसे बस *यूं ही* से नहीं भर देना चाहिए। आप के पास उस रोज़ का मेरा एक हिस्सा है। तुमको संजोते हुए कई बार मन और आत्मा ज़ख्मी हुए हैं मेरे। मैं किसी के सामने इस तरह कभी शिथिल नहीं पड़ी। जब तुम इस बात को समझोगे तो शर्मिंदा होंगे कि तुमने मुझमें एक भ्रम उगाया। ये अमरबेल मेरे नाश का कारण बन गयी। काट देना चाहिए था उगते ही। अब मन के इस दुख को कहाँ रखूं? खुद की आँखों में भी जगह नहीं बची। वहां भी ढेरों समुंदर उग आए हैं। मुझे नहीं लगता प्रेम को इस तरह दुखना दुखाना ठीक है। कम कम एक दिन थोड़ा भी नहीं बचता। मैं तुम्हें ये बद्दुआ भी नहीं दे सकती। तुम प्रेमिल इंसान हो। तुम्हें कमी रहे ....मेरी *बिखेरने का मुझको शौक है बड़ा... रहेगा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें