कल्पनाशब्दों के बीच
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प्रेम जितने कदम आगे चलता है उतने ही दुगने कदम पीछे जाता है

प्रेम जितने कदम आगे चलता है उतने ही दुगने कदम पीछे जाता है ..... बस इस लिए बना रहता है। तो हम तुम तो शुरू से ध्रुव थे, हैं और रहेंगे। हमारे बीच प्रेम ज्वार रहेगा ... आता जाता जाता आता * मुझसे प्रेम निकाल दो तो शांत नदी हूं प्रेम में मैंने खुद को अक्सर बेलौस समंदर किया है। तुम जा सकते हो मुझसे तो चले जाओ..... सारी बूंदे ,सब पानी तुम्हारा वो जो बादल है ना....मुझसे बना है । और तुम भी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें