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रचना 4369

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मुझमें ऐसे आया करो कि जैसे घर आ रहे हो

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मुझमें ऐसे आया करो कि जैसे घर आ रहे हो.... बेख़ौफ़ बे इरादतन बे हिसाब बेफ़िक्र बेशक हमारी उलझ दूसरों के हाथ होती है पर हमारी सुलझ हमारी अपनी सल्तनत होती है। धागे बेशक कम हो पर रेशमी हों तुमसे.... बस तुम्हारे से
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें