भाषा / Language
लिखती तो हूँ तुमको
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लिखती तो हूँ तुमको....
पर वो उभर कर नहीं आता कागज़ पर जो पी जाती हूँ रोज़।
रोज़ कागज़ पर
कच्ची मिट्टी के सकोरे गढ़ती हूं
बनते ही पानी भर देती हूँ
बह जाती है कविता
नम रह जाती हूँ मैं
गीली मिट्टी से तुम
तुम से सनी
बस रह जाती हूँ मैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें