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डाकिया

डाकिया..... तुम वो बारिश हो जो भीगते भिगाते एक रोज़ मेरी छतरी हो गए। प्रेम चल चल कर कितने मील पार कर लेता है बताओ ....मन तक पहुंच जाता है। बिना दिशा निर्देश बिना compass बिना नक्शे के मन खुद एक दिशा सूचक होता होगा शायद । हमेशा कहती हूँ....प्रेम में सब्र ईश्वर है। वही हमारी प्रार्थना हमारे अदृश्य पत्र प्रेमी तक पहुंचाता है। बिना वर्दी वाला अदृश्य डाकिया ।जो घर घर प्रेमी मन दरवाज़े से सरका आता है। मेरे दरवाज़े पर भी बंधा है तुम्हारे नाम का मन डाकिया अक्सर घण्टी बजाता है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें