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जो नहीं मिला बस वही बचा रह जाता है अंत्येष्टि के बाद

जो नहीं मिला बस वही बचा रह जाता है अंत्येष्टि के बाद जो जीवन भर मिला वो सारा स्याह हो जाता है। हम अस्थियों को जीवन भर क्यों ढोते हैं? कम का भार इतना क्यूं होता है? जो है नहीं उसका दुख हमारे हिस्से कौन लिखता है ? हम मिले को ना मिले से कम क्यूँ आँकते हैं? क्या हम जले हुए लोग हैं?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें