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अपनी टूट को संभालना आना चाहिए

अपनी टूट को संभालना आना चाहिए... टूटने में क्या शर्म..... आखिर में वही आपको जोड़ कर खड़ा करती है। टूट चेहरे पर तमाचा नहीं ...गालों पर थपकी है कि अभी कहां टुकड़े हुए तुम्हारे ?अभी तो बालू होना बाकी है तुम्हारा। अपनी टूट को आईने के सामने टांग कर रखती हूं। जब कभी खुद पर इतराने का मन करता है तो सामने पड़ी टूट पहन कर देखती हूं। असली सुंदर तब लगती हूं। टूट असली और एकमात्र श्रृंगार है ... खरा शुभ रात 💕
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें