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मैंने कभी नहीं कहा तुम्हारे संग चलूँगी

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मैंने कभी नहीं कहा तुम्हारे संग चलूँगी... मैंने हमेशा कहा ...मैं अंत तक रुकूँगी। *प्रेम असल में एक गहरा अवसाद देता है ।इसको उत्सव की तरह मनाना पड़ता है।आपको रूठने और मान जाने का शऊर आना ही चाहिए। किसी हाल न बदलने वाला मौसम हो जाते हैं प्रेमी...धीरे धीरे । एक दूसरे को दिया दुख और दूरी भी दिव्य होने लगती है। नाम सुनते ही याद और भुलावे के फूल एक साथ खिलते हैं अधरों पर तुमसे प्यार है ... तुमको कोई हाल नहीं बिसराया जा सकता। तुम धंस गए हो कंटक कोई सिरा बाहर बचा नहीं कि निकाला जा सके। रिसते रहो ।दुखते रहो। आनंद इसी में है प्रेम का। प्रेम का अवसाद मुझे खूबसूरत और जिंदा रखता है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें