कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4317

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हम अक्सर अपने सबसे क़रीबी जिससे मन का रेशम बांधा हो ,जिसको…

हम अक्सर अपने सबसे क़रीबी जिससे मन का रेशम बांधा हो ,जिसको रूह की ग़िरह दिखाई हो उसी से धक्का खाते हैं ।जिसको दूर दूर तक नहीं सोचते कि ये ठीक उस समय मोह काट देगा जब बस सुध बुध खो कर ख़ुशी से खाई में कूदने को बस होने ही वाले होते हैं। ये वाला पुश ब्रूटल होता है।आप बरसों तक इमोशनली drained होते जाते हैं। ।मेंटली paralysed फ़ील करते हैं।स्टैंड्स्टिल । इसके इतर कोई रैंडम अजनबी जिसका बस नाम सुना हो,चेहरा भी बस सामने से कभी कभार गुज़रा हो आँखों के आगे से ,आपको इतना प्यार सम्मान और आसमान आपकी हथेली में रख देता है कि लगता है उफ़्फ़ ये कौन गिर रहा बारिश सा। कोई तो जाने के बहाने ढूँढता है और कोई ऐसा भी टकरा जाता है जिसे जाओ कहो भी तो और कुछ पल रूक कर विदा को धकेलना चाहता है। कोई एक पल सोचता नहीं मन पर आरी चलाने से पहले और कोई बस यूँ ही हाथ पकड़ कर पास बैठने की जिद्द करता है कि आओ एक पल सुथरा कर लो ख़ुद को ।समेट कर नयी हो जाओ।फिर चली जाना। कोई अपना ये बोलना तक भूल जाता है कहना कि तुम्हारी याद आयी ,कहाँ थी अब तक ,कैसी हो? कोई दूर से आकर आँखों में झाँकता ही रह जाता है और मुस्कुराकर कहता है आज पहली बार मिले और लग रहा कई सालों से तुम्हारी याद में चल रहा हूँ। कोई सालों के गुँथे रिश्ते को भीड़ में बिखेर देता है ।आँख चुराता है।कोई पास आकर कानों में कहता है दो मिनट दोगी कुछ कहना है। दुनिया लोगों से बनती है ।अपने पराए लोगों का घोल।किस का हाथ पकड़ा जाए किसकी हथेली की पकड़ छूट जानी चाहिए थी अब तलक किसकी धूल झाड़ लेनी चाहिए और किस चंदन से लिपट जाना चाहिए-सीख लेना चाहिए। जाने किस को दूँ? जान किस को दूँ? तुम कहो मेरे अजनबी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें