भाषा / Language
लिखना
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लिखना....
लिख कर क्या करती हो कल्पना?
उसने पूछा
खुद में पानी मिला लेती हूं ....खूब सारा।
हर थक्का घुल जाता है।
हर ढेला ढह जाता है।
मैंने कहा
क्यूं तुमको पसंद नहीं क्या नीट शराब?
उसने पूछा
पानी में तो मैं घुली हूं...
कागज़ पर वही कसैली कल्पना ही उड़ेली है
मैंने हंसते हुए कहा।
खालिस मद कौन पसंद नहीं करता ....
मुझे तुम पानी मिली हुई ही पसंद हो।
कहते हुए उसने मेरी डायरी के पहले पन्ने पर अपना वाला एक तिरछा गिरा हुआ प्याला बना दिया।
मैंने चीयर्स कहकर उसकी तरफ अपनी पानी की बॉटल बढ़ा दी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें