भाषा / Language
प्रेम एक अक्षर से ही बन जाता है
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* प्रेम एक अक्षर से ही बन जाता है ....
आगे लिखे अक्षरों से प्रेमी नाम पूरा करते हैं।
आसक्ति से अनासक्ति की तरफ़ बढ़ते हुए मुझे ये मालूम होता है कि हम तुम दो बेहद मामूली लोग थे।मेरे किए प्रेम में तुम खास हुए। उस खास होने में मैं बेहद मामूली से आम होती गई।
फिर एक रोज़ जाना कि...
प्रेम की काट प्रेम ही है।
तुम चाह कर भी अप्रेम से मेरे प्रेम को छांट तो सकते हो काट नहीं सकते। तुम्हारे पास ऐसा कोई कारण हो ही नहीं सकता। अप्रेम तो और भी निहत्था है।
जानते हो...
बीज के अलावा भी कई तरीके हैं जुनूनी जो उग आते हैं ...
प्रेम तो फिर बौराया हरियल दरख़्त है।
क्या क्या गिनाया जाय।
मेरा पसंदीदा अमरबेल होना है वो भी अदृश्य।ऐसी की तुमको भी पता न चले।
मेरा होना तो हो पर दर्ज़ न हो तुम पर।
तुम पर तुम्हारी नहीं मेरी छाया का उधार रहे हमेशा। सुकून के अलावा कोई हक ना हो तुम्हारा मुझ पर ।
हम कह सकें ...आप बड़े अच्छे लगते हैं पर अच्छे लग जाने से दुनिया थोड़े ही चलती है।
वो जो भी चीज दुनिया में सिर्फ़ एक है और बस एक ही बार हुई ....बस वही तुम हो मेरे लिए।
और जब हो गए तो पलट कर "नहीं" कैसे हो पाएंगे।
मेरी आसक्ति में तुम थे और अनासक्ति में तुम ही खूब सारा नहीं रहोगे।
आबाद रहिए मेरे "नहीं " में भी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें