भाषा / Language
किसी को दुःख देकर लौटते हुए देखना कभी खुद को....हर कदम पर ए…
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किसी को दुःख देकर लौटते हुए देखना कभी खुद को....हर कदम पर एक पंख खुद से टूट कर गिरता जाता हो जैसे।
रात अकेले जब दिन का हिसाब बिस्तर पर लेट कर करते हैं तो हमें लगता हमारे सारे पंख गिर गए हैं ।हम छिल चुके हैं... बस एक डैना बचा है वो भी आत्मा में जा घुसा है।
आत्म को किलसकर मरते हुए देखना द्रवित करता है।
उस रोज़ ईश्वर भी हाथ झाड़ देता है और निद्रा भी।
*दुःख से नहीं बचा जा सकता पर दुःख देने से खुद को यकीनन बचाया जा सकता है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें