कल्पनाशब्दों के बीच
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मैंने हमेशा ख़ुद में दो दरवाज़े बने देखे और बस एक चाहना रखी…

मैंने हमेशा ख़ुद में दो दरवाज़े बने देखे और बस एक चाहना रखी कि ख़ुद का सम्मान क़ायम रख सकूँ।ख़ुश रह सकूँ। मुझमें भीतर आने वाला रास्ता संकरा है। सब नहीं आ सकते।मैं प्रश्न पूछूँगी।भीतर का रास्ता तालाबंद रखूँगी ।परखूँगी। क्यूँकि अपने आत्मसम्मान की जवाबदेही मेरी है।मुझे अपना मोल पता है। इसके इतर मुझ से बाहर का रास्ता खुला है ।कोई रुकावट - कोई बाड़ नहीं ।कोई प्रश्न नहीं।आप जा सकते हैं। जब जी चाहे। वजह अब भी वही है- अपने आत्मसम्मान की जवाबदेही मेरी है। मुझे अपना मोल पता है। * यहां मैं लिखा है पर आप सब भी "मैं" हो सकते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें