भाषा / Language
कितनी ही बार तुमने अनजाने मेरा नाम लिया... उसे लिखा।
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कितनी ही बार तुमने अनजाने मेरा नाम लिया... उसे लिखा।
हर बार मैंने उस लिखे को "कल्पना" कह कर बिसार दिया।
छुआ अपना नाम और चूम लिया।
अब याद आता है कि मैंने खोजा अधिक, पहचाना कम और पाया उससे भी कम।
तुमसे एक तरफ़ा संवाद ही मेरी कविता है।
तुम्हें अजनबी रखने के अपने सुख हैं ।तुम्हारे आने का पता नहीं चलता। तुम बस इसी तरह आ जाया करो।
इतना कितना सा प्रेम था ...जो दे नहीं पाए
एक ही दुःख कितना स्याही में बहाया जाए।
अगर मैं कहूँ...
तुम बस तुम ही हो...
बाक़ी दुनिया तो दुनिया में बहुत है।
मान लोगे?
* पहाड़ों पर बुरांश आने लगे हैं ।
मेरा बुरांश तुझ पर भी खिले कुछ इसी तरह।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें