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मैंने बनारस देखा नहीं है अभी तक पर मेरी wishlist में है। कु…

मैंने बनारस देखा नहीं है अभी तक पर मेरी wishlist में है। कुछ शहरों में जाना... रह जाना destiny में होता है। कल से जब से हाथ में व्योमेश शुक्ल जी की किताब *आग और पानी* हाथ में आई है, लग रहा बनारस के मोह में पड़ती जा रही। किताब हाथ में आते ही vibrations आई कि एक पूरा शहर मुझमें समाहित होने को है। किताब की पहली पंक्ति देखिए....*बनारस असंभव जगह है*। कितना बड़ा कैनवास एक पंक्ति में समा गया। अभी पहला चैप्टर ही पढ़ा है पर ऐसा लग रहा कितना कुछ है बनारस में जीने लायक । अंतस में धरने लायक। हर पंक्ति बोलती हो किताब में ऐसा अमूमन कम ही होता है पर इस गद्य की ज्यादातर पंक्तियां आपसे संवाद करती हैं ।उकेरती जाती हैं खूबसूरती और रखती जाती हैं बनारस का इतिहास और उसकी परंपरा।आप नैन भर देखते जाते हैं एक पुराने शहर का जादू और उन नयनाभिराम दृश्यों में खुद की जगह मार्क करते हैं....चाहे वो मनिकर्णिका घाट हो,ललिताघाट हो,बनारसी गलियां हों या गंगा आरती का घाट। पढ़ते पढ़ते मेरा मन एक अन लिखी iteniary बनाता चल रहा था कि कभी अगर बनारस गई तो क्या क्या और कहां कहां जीना है । इतना मनमोहक गद्य है कि लगता है नदी बह रही और बनारस उसमें डोल रहा। अभी तक जो पढ़ा उसमें गंगा मैया के लिए अपार चिंता, वहां की परंपराओं को जीवित रखने की जद्दोजहद , नेमी रामलीला,जीवन और मृत्यु के बीच बनारस की भूमिका,बनारस का नवीनीकरण,उसका आतिथ्य,उससे लिपटी सांस्कृतिक विरासत,बनारस से जुड़े असंख्य प्रश्न और अनंत आशाएं दिखाई दी। बहुत दिनों बाद एक उत्कृष्ट गद्य पढ़ने को मिला। बहुत बहुत आभार व्योमेश जी और रुख प्रकाशन इतनी खूबसूरत किताब हम तक पहुंचाने के लिए। कुछ पंक्तियां सांझा कर रही जो किताब में मार्क की हैं। *निर्गुण के गुण राम हैं और सगुण मस्जिद में सोया है। *मृत्यु शोक का सबसे गाढ़ा मौका है। *नदी रेत में छिपी है। *समय नाव में बैठा है। *उसकी दिनचर्या किसी कविता जैसी है। *बनारस जितना बिस्मिल्लाह की तरह संस्थापित है,उतना ही रविशंकर की तरह विस्थापित। *बनारस की नागरिकता समयतीत है। *बनारस में मरने से मुक्ति मिलती है ।लोग मरने के लिए यहां आते हैं। *जैसे मां नहीं बदली जा सकती ,वैसे ही नदी भी। *पांच सौ बरस पुरानी सांस। अभी बस २५ पन्ने पढ़ पाई हूं पर मन के पटल पर बनारस की असंख्य तस्वीरें छप रही हैं। अद्भुत शिल्प से लिखी इस किताब को अपने खजाने में जरूर जोड़ें। आगे पढ़ कर फिर मिलूंगी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें