कल्पनाशब्दों के बीच
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मैं जानती थी अपना हश्र

मैं जानती थी अपना हश्र..... फिर भी चुना प्रेम मुझे पता था.... जल में से जल अग्नि में से अग्नि वायु में से वायु आकाश में से आकाश और पृथ्वी में से पृथ्वी बस प्रेम ही पृथक कर पाएगा। बस इस लिए बुदबुदाया तुम्हारा नाम ब्रह्म मुहूर्त में आराधा तुमको संध्या बाती में मांगा तुमको ख़ाली हाथ पूरे मन से अज्ञेय प्रेम में अनभिज्ञ कल्पना तुम्हारी है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें